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UCC पर अमित शाह को बधाई, अखिलेश पर ब्रिज लाल का तीखा हमला

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Dainik India News

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UCC पर अमित शाह को बधाई, अखिलेश पर ब्रिज लाल का तीखा हमला

पूर्व डीजीपी एवं राज्यसभा सदस्य ब्रिज लाल ने कहा—समान नागरिक संहिता विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में समान कानूनी व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम; अखिलेश यादव के ‘अंडरग्राउंड कम्युनल कांस्पिरेसी’ बयान पर उठाए सवाल

दैनिक इंडिया न्यूज़, नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश में तेज होती राजनीतिक बहस के बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं राज्यसभा सदस्य ब्रिज लाल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रुख का समर्थन करते हुए उन्हें बधाई और साधुवाद दिया है। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना है। गौरतलब है कि अमित शाह ने हाल में कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-नीत एनडीए द्वारा शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। वर्तमान में यह पूरे देश में लागू नहीं है; उत्तराखंड में इसे लागू किया जा चुका है, जबकि अन्य राज्यों में इसकी प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में है।

ब्रिज लाल के अनुसार, समान नागरिक संहिता लैंगिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है तथा विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों से उत्पन्न कानूनी जटिलताओं को कम कर सकती है। उनका कहना है कि देश संविधान और उसके अधीन बनाए गए कानूनों से चलता है। इसी क्रम में उन्होंने व्यक्तिगत कानूनों और शरीयत से संबंधित बहस को संविधान के सर्वोच्च विधिक ढांचे के संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

UCC पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की हालिया टिप्पणी को लेकर भी उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। यादव ने UCC को ‘अंडरग्राउंड कम्युनल कांस्पिरेसी’ बताते हुए भाजपा पर जनता का ध्यान अन्य मुद्दों से हटाने का आरोप लगाया है। उन्होंने यह भी कहा है कि UCC पर आगे बढ़ने से पहले सरकार को अपने चुनावी वादों पर ध्यान देना चाहिए।

इसके जवाब में ब्रिज लाल ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की पिछली सरकार की नीतियों पर कई गंभीर सवाल उठाए और इन्हें अपनी राजनीतिक भाषा में ‘ओपन कम्युनल कांस्पिरेसी’ करार दिया। हालांकि, इन आरोपों को उनके राजनीतिक वक्तव्य के रूप में ही देखा जाना चाहिए तथा इनमें उल्लिखित घटनाओं और नीतिगत फैसलों का अंतिम तथ्यात्मक मूल्यांकन संबंधित सरकारी दस्तावेजों एवं न्यायिक अभिलेखों के आधार पर ही किया जा सकता है।

उन्होंने अखिलेश यादव सरकार की उस योजना का उल्लेख किया, जिसके तहत मुस्लिम छात्राओं को कक्षा 10वीं उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई या विवाह के लिए 30 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया था। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, मार्च 2012 में तत्कालीन राज्य सरकार ने मुस्लिम छात्राओं के लिए 30 हजार रुपये की विशेष प्रोत्साहन राशि की घोषणा की थी। बाद में योजना का दायरा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों तक विस्तारित किए जाने और राशि में परिवर्तन की भी रिपोर्ट सामने आई।

इसी को आधार बनाते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी विशेष समुदाय की बेटियों के लिए लक्षित आर्थिक सहायता दी गई, तो अन्य सामाजिक वर्गों की बेटियों के लिए समान व्यवस्था क्यों नहीं की गई। उनका आरोप था कि ऐसी नीतियां सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्न खड़ा करती हैं और इसी आधार पर उन्होंने इसे ‘ओपन कम्युनल कांस्पिरेसी’ की संज्ञा दी।

इसके बाद उन्होंने 2013 में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अभियोजन वापस लेने की तत्कालीन सरकार की पहल का मुद्दा उठाया। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, समाजवादी पार्टी सरकार ने 14 मामलों में अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिनमें 19 आरोपी शामिल थे। इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी गई और बाद की न्यायिक प्रक्रिया में सरकार की पहल पर रोक सहित कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए। एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इन 14 मामलों में बाद में आठ मामलों में आरोपियों को बरी किया गया, जबकि चार मामलों में दोषसिद्धि हुई।

ब्रिज लाल ने कहा कि इन मामलों में आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े आरोपी भी शामिल थे और अभियोजन वापस लेने के प्रयास ने कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। हालांकि, इस प्रकरण में यह अंतर महत्वपूर्ण है कि सरकार द्वारा अभियोजन वापस लेने का प्रयास और किसी आरोपी का अंतिम रूप से दोषी या निर्दोष ठहराया जाना अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

कब्रिस्तानों की चारदीवारी के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा किए गए प्रावधानों को भी उन्होंने अपनी आपत्तियों का हिस्सा बनाया। समकालीन रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2012-13 के बजट में मुस्लिम कब्रिस्तानों के रखरखाव के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था और उनकी चारदीवारी के लिए योजना शुरू की गई थी। ब्रिज लाल का आरोप है कि ऐसी योजनाओं में अन्य धार्मिक समुदायों के धार्मिक स्थलों के प्रति समान दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया तथा सरकारी और ग्राम समाज की भूमि से जुड़े विवाद भी सामने आए।

अपने बयान में उन्होंने 6 जुलाई 2011 के मुरादाबाद के मैनाठेर कांड का भी विस्तार से उल्लेख किया। उनके अनुसार, एक आपराधिक घटना की जांच के लिए पुलिस कार्रवाई के बाद धार्मिक पुस्तक के कथित अपमान की अफवाह फैली, जिसके बाद हिंसा भड़क उठी। पुलिस वाहनों में आगजनी की गई और तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह पर जानलेवा हमला किया गया। उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा के दौरान डीआईजी गंभीर रूप से घायल हुए थे और पुलिसकर्मियों पर भी हमला हुआ था।

इस मामले में मार्च 2026 में मुरादाबाद की अदालत ने 16 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने आरोपियों को दंगा, हत्या के प्रयास, डकैती तथा आगजनी सहित विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराया। अभियोजन के अनुसार, मामले की सुनवाई लंबी चली और बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

ब्रिज लाल ने इस न्यायिक फैसले को अपने आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि गंभीर आपराधिक मुकदमों में न्यायिक प्रक्रिया अंततः अदालत के निर्णय तक पहुंची। उनके मुताबिक, यह घटनाक्रम उस समय की कानून-व्यवस्था संबंधी नीतियों की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था का जिक्र करते हुए उन्होंने तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में पीएसी की 46 कंपनियों तथा एटीएस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, बाद की सरकारों ने पीएसी में भर्ती के साथ सुरक्षा ढांचे का विस्तार किया और तीन नई महिला पीएसी बटालियनों का गठन किया। इन दावों को उन्होंने सरकारों की कानून-व्यवस्था संबंधी नीतियों के तुलनात्मक संदर्भ में रखा।

अपने वक्तव्य के अंतिम हिस्से में पूर्व डीजीपी ने आतंकवाद से जुड़े एक मामले में अपने और 38 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध दर्ज मुकदमे का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि खालिद मुजाहिद की मृत्यु को लेकर उनके विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे बाद में सरकार बदलने पर समाप्त कर दिया गया। उन्होंने इस प्रकरण को तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध की गई राजनीतिक कार्रवाई के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।

ब्रिज लाल ने कहा कि UCC को लेकर राजनीतिक मतभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन व्यक्तिगत कानूनों, समान नागरिक अधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता पर बहस तथ्यों तथा विधिक प्रावधानों के आधार पर होनी चाहिए। दूसरी ओर, अखिलेश यादव UCC के प्रस्तावित विस्तार को लेकर अपनी आपत्तियां सार्वजनिक कर चुके हैं। ऐसे में समान नागरिक संहिता का प्रश्न आने वाले समय में कानूनी सुधार के साथ-साथ केंद्र और विपक्ष के बीच व्यापक राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

— ब्रिज लाल, आईपीएस (सेवानिवृत्त), सदस्य, राज्यसभा

लखनऊ, 16 सितंबर 2026

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