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राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 26 जनवरी को सांख्य, वेदांत और गीता दर्शन पर दिया व्याख्यान

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Dainik India News

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राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 26 जनवरी को सांख्य, वेदांत और गीता दर्शन पर दिया व्याख्यान

नई दिल्ली। राष्ट्रीय सनातन महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 26 जनवरी के अवसर पर महासंघ परिवार के समक्ष गीता, वेदांत और सांख्य दर्शन के गहन और प्रासंगिक पहलुओं पर व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने वक्तव्य में भारतीय दर्शन की महान परंपरा का उल्लेख करते हुए इसे मानव जीवन का मार्गदर्शक बताया।

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सांख्य दर्शन को समझाते हुए कहा कि यह दर्शन आत्मा और प्रकृति के भेद को स्पष्ट करता है। उन्होंने इसे उदाहरण के माध्यम से सरलता से समझाया। जैसे, घड़ी समय बताती है, लेकिन समय घड़ी से स्वतंत्र होता है। इसी प्रकार, आत्मा और शरीर का भेद समझना व्यक्ति को मोह और बंधनों से मुक्त करता है।

गीता पर चर्चा करते हुए उन्होंने भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए सांख्य और योग के समन्वय का उल्लेख किया। उन्होंने गीता के श्लोक "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय…" का उदाहरण देते हुए आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता के संदेश को समझाया। उन्होंने कहा कि गीता का निष्काम कर्मयोग वर्तमान युग में भी अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें सिखाता है कि कर्म का फल सोचे बिना अपने कर्तव्यों का पालन करें।

वेदांत दर्शन पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि वेदांत ब्रह्म और माया के सिद्धांत पर आधारित है। उन्होंने इसे 'रस्सी और सांप' के उदाहरण से समझाया और बताया कि जैसे अंधेरे में रस्सी को सांप समझने का भ्रम होता है, वैसे ही माया के कारण आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना कठिन हो जाता है।

अपने व्याख्यान में उन्होंने यह भी कहा कि आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में गीता, सांख्य और वेदांत के सिद्धांत मानसिक शांति और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे इन दर्शनों के मूल्यों को आत्मसात करें और अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

राष्ट्रीय सनातन महासंघ परिवार के सदस्यों ने अध्यक्ष के इस व्याख्यान को बहुत ध्यान से सुना और उनके विचारों को सराहा। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि महासंघ इन दार्शनिक सिद्धांतों को समाज में प्रसारित करने के लिए निरंतर कार्य करेगा।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वेदांत और सांख्य दर्शन के जो भी गहन और मूल्यवान विचार उनके ज्ञान में आए हैं, वे उनके अपने प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि मां पूर्ण प्रज्ञा का आशीर्वाद स्वरूप प्रसाद हैं। उन्होंने इसे अपनी साधना और मां के अनुग्रह का फल बताते हुए कहा कि यह उनके लिए प्रेरणा का स्रोत है और वे इसे समाज में प्रसारित करने का प्रयास जारी रखेंगे। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि इस दिव्य ज्ञान को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

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