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प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का पुनर्जागरण – लोहिया संस्थान बना साक्षी

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Dainik India News

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प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का पुनर्जागरण – लोहिया संस्थान बना साक्षी

"संस्कृतभारती और लोहिया संस्थान की साझी पहल से लौटी प्राचीन चिकित्सा की सुनहरी यादें"

आज लोहिया संस्थान में इतिहास फिर जीवंत हुआ


दैनिक इंडिया न्यूज़ लखनऊ — संस्थान के एकेडमिक परिसर में प्राचीन भारत की गौरवशाली चिकित्सा विरासत को नया रूप देने वाली "संस्कृत–पट्टिका वीथिका" का लोकार्पण संस्कृतभारती के नेतृत्व में भव्य समारोह के साथ हुआ। दीप प्रज्वलन कर इस पवित्र क्षण को संस्थान के निदेशक डा. सी. एम. सिंह, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. विक्रम सिंह, चिकित्सा अधीक्षक डा. अरविंद कुमार सिंह, संस्कृतभारतीन्यास अवध प्रांत के अध्यक्ष जितेन्द्र प्रताप सिंह और क्षेत्रीय संगठन मंत्री (पूर्व क्षेत्र) प्रमोद पंडित , कोषाध्यक्ष राहुल सिंह ने और भी खास बना दिया।

इन विशेष पट्टिकाओं पर सदियों पूर्व ऋषियों द्वारा चिकित्सा विज्ञान में किए गए अद्वितीय शोध, उपचार पद्धतियों और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों को संस्कृत श्लोकों के माध्यम से संजोया गया है। परिसर में सजे ये अमूल्य शब्द आने वाले चिकित्सकों, विद्यार्थियों और आगंतुकों को हमारे प्राचीन चिकित्सा ज्ञान की गंभीरता, गरिमा और वैश्विक महत्व से रूबरू कराएंगे। यह आयोजन केवल एक लोकार्पण नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का एक प्रेरणादायी संकल्प है।

"गौरवशाली अतीत से उज्ज्वल भविष्य तक, संस्कृतभारती का ज्ञान–सेतु"

संस्कृत पट्टिकाओं पर लिखे अमूल्य श्लोक बताते हैं कि भारतीय चिकित्सा ज्ञान केवल बीते समय की संपत्ति नहीं, बल्कि दूरदृष्टि और वैज्ञानिक सोच से परिपूर्ण था। शरीर की संरचना, औषधियों का ज्ञान, शल्य चिकित्सा और रोग निवारण जैसे अद्भुत सिद्धांत हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले ही समझ और लागू कर लिए थे — और आज भी यह ज्ञान उतना ही प्रासंगिक है।
यह पहल हमें अपनी उस गौरवशाली ज्ञान-परंपरा की याद दिलाती है, जिसने दुनिया को स्वस्थ जीवन का मार्ग दिखाया। यह सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि आने वाले कल को प्रेरित करने वाला उज्ज्वल संदेश है।"

संयुक्त आयोजन में संस्कृतभारती न्यास, अवध प्रांत के अध्यक्ष जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा

"संस्कृत हमारी पहचान ही नहीं, बल्कि असीम ज्ञान का श्रोत है। हमारे ऋषियों ने आध्यात्मिकता के साथ-साथ चिकित्सा, गणित, खगोल और विज्ञान के क्षेत्रों में भी ऐसे अद्वितीय योगदान दिए, जो आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक हैं।" उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत का सम्पूर्ण प्राचीन ज्ञान संस्कृत में सुरक्षित है। इसलिए ज़रूरत है कि हम इस भाषा को सीखें, शोध करें और इन अनमोल ग्रंथों से निकला ज्ञान समाज के हित में सामने लाएँ। श्री सिंह का यह संदेश सिर्फ़ एक विचार नहीं, बल्कि एक पवित्र आह्वान है — अपनी जड़ों को पहचानने, उनसे जुड़ने और पूरे विश्व के सामने गर्व से यह बताने का कि भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत किसी खज़ाने से कम नहीं।

कार्यक्रम में लोहिया संस्थान के निदेशक डॉ. सी. एम. सिंह ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा

संस्कृत भाषा में चिकित्सा विज्ञान के मूल सिद्धांतों को प्रस्तुत करना आने वाले डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। यह हमारे देश की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत का जीवंत प्रमाण है।

वहीं, क्षेत्रीय संगठन मंत्री प्रमोद पंडित ने इस अवसर को "ज्ञान और संस्कृति के संगम का अनुपम क्षण" बताया और संस्कृतभारती के सभी कार्यकर्ताओं, लोहिया संस्थान के प्रबंधन तथा इस आयोजन की मुख्य सूत्रधार डा. रिचा चौधरी को हृदय से धन्यवाद दिया।यह सिर्फ़ एक आयोजन नहीं था, बल्कि एक भावना थी — अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक गौरव को नई पीढ़ी के मन में जगाने का संकल्प।

इस अवसर पर मौजूद अतिथियों और चिकित्सकों ने जब पट्टिकाओं का अवलोकन किया, तो सभी के चेहरे गर्व और उत्साह से चमक उठे।सभी ने माना कि ऐसी पहल से न केवल संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार होगा, बल्कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान को विश्व पटल पर नई पहचान मिलेगी। प्रदर्शनी को देखकर प्राध्यापकों और छात्रों ने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया कि भारत का चिकित्सा शास्त्र कितनी अद्वितीय और उच्चतम कोटि का था — जहाँ विज्ञान, ज्ञान और मानव सेवा का संगम देखने को मिलता है।

यह क्षण केवल एक प्रदर्शन का नहीं, बल्कि अपनी विरासत पर नए सिरे से गर्व करने और उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा का था।

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