ब्रेकिंग न्यूज़
भोजशाला विवाद निर्णायक मोड़ पर, सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत न मिलने पर हिंदू पक्ष उत्साहित | भोजशाला में बड़ी विजय की ओर हिंदू पक्ष, सुप्रीम कोर्ट के रुख से मुस्लिम पक्ष में बढ़ी बेचैनी | मुख्यमंत्री डैशबोर्ड समीक्षा बैठक में सीडीओ सख्त, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और जनपद की रैंकिंग सुधारने के दिए निर्देश | होमगार्ड भर्ती प्रक्रिया का जिलाधिकारी आनंद वर्द्धन ने किया औचक निरीक्षण, निष्पक्षता और पारदर्शिता पर दिया विशेष जोर | महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — अभयानंद सरस्वती | भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का सूत्रपात, बाल संस्कारशाला अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का आह्वान | गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा : ब्रह्मविद्या, ऋतंभरा प्रज्ञा और विवेक का सनातन रहस्य - अभयानंद सरस्वती | 'केवल वृक्ष मत लगाइए, वृक्षपालक बनिए' : जितेंद्र प्रताप सिंह | भोजशाला विवाद निर्णायक मोड़ पर, सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत न मिलने पर हिंदू पक्ष उत्साहित | भोजशाला में बड़ी विजय की ओर हिंदू पक्ष, सुप्रीम कोर्ट के रुख से मुस्लिम पक्ष में बढ़ी बेचैनी | मुख्यमंत्री डैशबोर्ड समीक्षा बैठक में सीडीओ सख्त, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और जनपद की रैंकिंग सुधारने के दिए निर्देश | होमगार्ड भर्ती प्रक्रिया का जिलाधिकारी आनंद वर्द्धन ने किया औचक निरीक्षण, निष्पक्षता और पारदर्शिता पर दिया विशेष जोर | महाशिवरात्रि : अद्वैत-तत्त्व की परम महानिशा — अभयानंद सरस्वती | भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का सूत्रपात, बाल संस्कारशाला अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का आह्वान | गुरुसत्ता के प्रति अहर्निश निष्ठा : ब्रह्मविद्या, ऋतंभरा प्रज्ञा और विवेक का सनातन रहस्य - अभयानंद सरस्वती | 'केवल वृक्ष मत लगाइए, वृक्षपालक बनिए' : जितेंद्र प्रताप सिंह |
हाइलाइट न्यूज़
बाहुबली युग से आगे बढ़कर ‘बायो युग’ की ओर बढ़ रहा है उत्तर प्रदेश : राजनाथ सिंह होली के पावन पर्व पर प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं- अजीत सिंह महाकुंभ 2025 के निमंत्रण हेतु बेंगलुरु में मंत्री सुरेश कुमार खन्ना और नरेंद्र कश्यप ने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से की भेंट जिलाधिकारी ने गोबर से पेंट बनाने वाली परियोजना का किया शुभारंभ <em>द्विदिवसीय WDA</em> - <em>उप-मुख्यमंत्री ने वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता के दूसरे दिन प्रतिभागी खिलाडियों का किया उत्साहवर्धन</em> सिंगल यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ चला अभियान, कई लोगों से वसूला जुर्माना समाज सुधार का जज़्बा बड़ा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती:जेपी सिंह अधिकारियों पर गरजे योगी, संवेदनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी बाहुबली युग से आगे बढ़कर ‘बायो युग’ की ओर बढ़ रहा है उत्तर प्रदेश : राजनाथ सिंह होली के पावन पर्व पर प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं- अजीत सिंह महाकुंभ 2025 के निमंत्रण हेतु बेंगलुरु में मंत्री सुरेश कुमार खन्ना और नरेंद्र कश्यप ने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से की भेंट जिलाधिकारी ने गोबर से पेंट बनाने वाली परियोजना का किया शुभारंभ <em>द्विदिवसीय WDA</em> - <em>उप-मुख्यमंत्री ने वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता के दूसरे दिन प्रतिभागी खिलाडियों का किया उत्साहवर्धन</em> सिंगल यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ चला अभियान, कई लोगों से वसूला जुर्माना समाज सुधार का जज़्बा बड़ा हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती:जेपी सिंह अधिकारियों पर गरजे योगी, संवेदनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी
मध्य प्रदेश English

कोविड वैक्सीन के दुष्प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख — पीड़ितों के लिए मुआवजा नीति बनाने को कहा

D

Dainik India News

60 views
कोविड वैक्सीन के दुष्प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख — पीड़ितों के लिए मुआवजा नीति बनाने को कहा

जनहित याचिकाओं में उठे मौत और गंभीर दुष्प्रभाव के सवाल; अदालत ने केंद्र से स्पष्ट नीति और जवाबदेही तय करने को कहा

दैनिक इंडिया न्यूज़,नई दिल्ली।कोविड-19 महामारी के दौरान देशव्यापी टीकाकरण अभियान को लेकर अब एक नया संवैधानिक और नैतिक प्रश्न न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुँच गया है। कोविड वैक्सीन के कथित दुष्प्रभावों और कुछ मामलों में हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने केंद्र सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि टीकाकरण के बाद किसी व्यक्ति को गंभीर प्रतिकूल प्रभाव होता है या मृत्यु होती है, तो पीड़ित परिवारों के लिए एक ठोस मुआवजा नीति तैयार की जानी चाहिए। अदालत का यह निर्देश 10 मार्च 2026 को उस समय सामने आया जब न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की पीठ कोविड वैक्सीन से जुड़े मामलों पर विस्तृत सुनवाई कर रही थी।


यह पूरा विवाद उस समय राष्ट्रीय बहस का विषय बना जब Rachana Gangu सहित कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाओं में दावा किया गया कि कोविड टीकाकरण के बाद कई व्यक्तियों को गंभीर स्वास्थ्य जटिलताएँ हुईं और कुछ मामलों में मौत तक हो गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार ने महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को वैक्सीन लेने के लिए प्रेरित किया, किंतु यदि किसी नागरिक को इसके कारण गंभीर प्रतिकूल प्रभाव होता है तो उसके लिए मुआवजा देने की कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति मौजूद नहीं है। यही कारण था कि उन्होंने अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।


याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में जब सरकार स्वयं व्यापक टीकाकरण अभियान चलाती है और नागरिकों को इसके लिए प्रेरित करती है, तब राज्य की यह जिम्मेदारी बनती है कि संभावित जोखिमों की स्थिति में पीड़ितों को राहत देने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करे। याचिका में यह भी कहा गया कि विकसित देशों में वैक्सीन से जुड़े दुष्प्रभावों के लिए मुआवजा योजनाएँ पहले से मौजूद हैं, जबकि भारत में ऐसा कोई समर्पित ढांचा नहीं है।


सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी उठाया गया कि कोविड टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की जांच के लिए भारत में AEFI (Adverse Events Following Immunisation) नामक तंत्र मौजूद है, किंतु उसका कार्यक्षेत्र केवल घटनाओं की जांच तक सीमित है। पीड़ित परिवारों को आर्थिक राहत देने के लिए कोई निश्चित व्यवस्था नहीं है। अदालत ने इसी बिंदु पर गंभीर चिंता व्यक्त की।


न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महामारी के दौरान टीकाकरण अभियान एक विशाल सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम था, जिसे राज्य के संरक्षण और प्रोत्साहन में संचालित किया गया। ऐसे में यदि किसी नागरिक को गंभीर प्रतिकूल प्रभाव का सामना करना पड़ता है, तो उसे राहत पाने के लिए वर्षों तक न्यायालयों की परिक्रमा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक “नो-फॉल्ट मुआवजा नीति” तैयार करने पर विचार करे, जिसमें पीड़ित को राहत प्राप्त करने के लिए सरकार या वैक्सीन निर्माता की लापरवाही सिद्ध करना अनिवार्य न हो।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह पक्ष रखा गया कि कोविड टीकाकरण के दौरान सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखा गया था और भारत में प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए एक वैज्ञानिक व्यवस्था पहले से मौजूद है। सरकार ने यह भी कहा कि अधिकांश मामलों में टीकाकरण सुरक्षित साबित हुआ है और गंभीर दुष्प्रभाव अत्यंत दुर्लभ हैं। इसके बावजूद अदालत ने यह माना कि यदि ऐसे दुर्लभ मामले सामने आते हैं, तो उनके लिए राहत का एक संस्थागत तंत्र होना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजा नीति बनाने का अर्थ यह नहीं होगा कि सरकार या वैक्सीन निर्माता अपनी किसी गलती को स्वीकार कर रहे हैं। बल्कि इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी नागरिक को सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के दौरान गंभीर नुकसान होता है, तो उसे समय पर सहायता मिल सके।


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह रुख केवल एक स्वास्थ्य नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों से जुड़ा विषय है। महामारी के समय जब पूरा देश असाधारण परिस्थितियों से गुजर रहा था, तब करोड़ों लोगों ने सरकारी अपील पर भरोसा करते हुए टीकाकरण कराया। ऐसे में यदि कुछ मामलों में प्रतिकूल परिणाम सामने आते हैं, तो उनके प्रति राज्य की संवेदनशीलता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।


इस आदेश के बाद अब देश की निगाहें केंद्र सरकार की अगली कार्यवाही पर टिकी हैं। यदि सरकार अदालत के निर्देशों के अनुरूप मुआवजा नीति तैयार करती है, तो यह भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता का एक नया अध्याय साबित हो सकता है। वहीं यह मामला यह भी याद दिलाता है कि महामारी से लड़ाई केवल चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि शासन, न्याय और नागरिक अधिकारों की भी परीक्षा थी — और शायद अभी भी है।

फोटो गैलरी

टिप्पणियाँ

अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले टिप्पणी करें!