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केवल वृक्षारोपण नहीं, "वृक्षपालक" बनने का समय: जितेंद्र प्रताप सिंह

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केवल वृक्षारोपण नहीं, "वृक्षपालक" बनने का समय: जितेंद्र प्रताप सिंह

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता — जितेंद्र प्रताप सिंह

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 दैनिक इंडिया न्यूज़,लखनऊ, 12 जुलाई। राजधानी लखनऊ के पद्मश्री डॉ. एस.सी. राय पार्क, महानगर विस्तार में आयोजित "एक वृक्ष माँ के नाम" वृक्षारोपण अभियान के अवसर पर राष्ट्रीय सनातन महासंघ के वरिष्ठ पदाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ते हुए देशव्यापी वृक्ष संरक्षण आंदोलन का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केवल वृक्षारोपण से पर्यावरण सुरक्षित नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक नागरिक को "वृक्षपालक" बनना होगा। जब तक लगाए गए पौधों को वृक्ष बनने तक संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक जलवायु परिवर्तन की चुनौती का प्रभावी समाधान संभव नहीं है।

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उन्होंने कहा कि "आज हम केवल एक पौधा लगाने के लिए एकत्रित नहीं हुए हैं, बल्कि पृथ्वी के भविष्य, आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित जीवन तथा अपनी मातृभूमि के संरक्षण का संकल्प लेने के लिए एकत्र हुए हैं। 'एक वृक्ष माँ के नाम' अभियान केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी जन्मदात्री माँ और प्रकृति माँ—दोनों के प्रति कृतज्ञता एवं श्रद्धा का सजीव प्रतीक है।"

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अपने संबोधन में जितेंद्र प्रताप सिंह ने भारत सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासन, नगर निकायों, सामाजिक संगठनों तथा देश के प्रत्येक नागरिक से पर्यावरण संरक्षण के लिए दीर्घकालिक एवं व्यवहारिक नीति अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय कर लाखों-करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, किंतु प्रतिकूल मौसम और समुचित संरक्षण के अभाव में बड़ी संख्या में पौधे कुछ ही महीनों में नष्ट हो जाते हैं। इससे न केवल पर्यावरणीय उद्देश्य अधूरा रह जाता है, बल्कि सार्वजनिक धन का अपेक्षित परिणाम भी प्राप्त नहीं हो पाता।

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उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र एवं राज्य सरकारें मानसून प्रारंभ होने के उपरांत एक उपयुक्त तिथि को राष्ट्रीय वृक्षारोपण दिवस के रूप में निर्धारित करें, ताकि पर्याप्त नमी के कारण पौधों के जीवित रहने की संभावना अधिक हो और वृक्षारोपण अभियान वास्तविक सफलता प्राप्त कर सके।

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जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि "पौधा लगाना एक दिन का कार्य है, किंतु उसे वृक्ष बनाना पाँच वर्षों की तपस्या है।" उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जो भी व्यक्ति, संस्था अथवा संगठन पौधा लगाए, वह कम-से-कम पाँच वर्षों तक उसके संरक्षण एवं संवर्धन का उत्तरदायित्व भी निभाए। उन्होंने कहा कि देश को केवल वृक्ष लगाने वाले नहीं, बल्कि वृक्षपालक चाहिए।

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उन्होंने कहा कि आज सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट से जूझ रहा है। लगातार बढ़ता तापमान, हीट वेव, अनियमित वर्षा, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं सूखा, भूजल स्तर में गिरावट, वायु प्रदूषण तथा नई-नई बीमारियाँ मानव सभ्यता के सामने गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। इन सभी समस्याओं का सबसे सरल, सबसे सुलभ और सबसे प्रभावी समाधान व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण और उससे भी अधिक वृक्षों का संरक्षण है।

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उन्होंने कहा कि यदि भारत का प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में "एक वृक्ष माँ के नाम" लगाकर उसके संरक्षण का संकल्प ले, तो करोड़ों नए वृक्ष देश के पर्यावरणीय संतुलन को पुनर्स्थापित कर सकते हैं। यही वृक्ष भविष्य में शुद्ध वायु, संतुलित वर्षा, भूजल संरक्षण, जैव विविधता और स्वस्थ जीवन के आधार बनेंगे।

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कार्यक्रम के अंत में उन्होंने विद्यालयों, महाविद्यालयों, चिकित्सालयों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, धार्मिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों एवं प्रत्येक परिवार से इस अभियान को जन-आंदोलन बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि अब समय केवल वृक्षारोपण का नहीं, बल्कि "वृक्षपालक" बनने का है। प्रत्येक नागरिक अपने लगाए हुए पौधे को परिवार के सदस्य की तरह अपनाए, उसकी नियमित देखभाल करे और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखे। यही प्रकृति, राष्ट्र और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी सेवा होगी।

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उन्होंने अंत में सभी नागरिकों से आह्वान किया कि "एक वृक्ष माँ के नाम" केवल एक अभियान बनकर न रह जाए, बल्कि प्रत्येक भारतीय के जीवन का संस्कार बने। यदि आज हम अपनी जिम्मेदारी समझकर एक-एक वृक्ष के संरक्षण का संकल्प ले लें, तो आने वाली पीढ़ियों को एक हरित, स्वच्छ, स्वस्थ और जलवायु-संतुलित भारत प्रदान किया जा सकता है। केवल वृक्ष मत लगाइए, वृक्षपालक बनिए। यही इस अभियान का मूल मंत्र है।

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