हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर पूर्व आईएएस अजयदीप सिंह का संदेश—राजभाषा को जनसंवाद, न्याय, प्रशासन और ज्ञान-विज्ञान की समर्थ भाषा बनाने पर जोर
दैनिक इंडिया न्यूज़ , लखनऊ।हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अजयदीप सिंह ने हिंदी को केवल भाषायी गौरव का विषय मानने के बजाय उसे शासन, न्याय, शिक्षा और ज्ञान तक नागरिक की सहज पहुंच से जोड़ते हुए व्यापक विमर्श की आवश्यकता बताई। दैनिक इंडिया न्यूज़ के संपादक हरिंद्र सिंह के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रति सम्मान किसी एक दिन की औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार संवैधानिक रूप से हिंदी भारत की राजभाषा है, लेकिन वास्तविक चुनौती यह है कि उसे राजकाज और जनजीवन में उसकी सामर्थ्य के अनुरूप कितना प्रभावी स्थान मिला है।
अजय दीप सिंह ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा कहे जाने को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है, जबकि संवैधानिक व्यवस्था में हिंदी को राजभाषा का स्थान प्राप्त है। इसलिए उनके अनुसार वर्तमान विमर्श का केंद्र यह होना चाहिए कि राजभाषा के संवैधानिक स्वरूप को व्यवहार में किस तरह अधिक प्रभावी बनाया जाए। सवाल केवल भाषा के नाम या दर्जे का नहीं, बल्कि शासन और नागरिक के बीच संवाद को कितना सहज बनाया जा सकता है, इसका है।
यहां से बातचीत सामान्य भाषायी चर्चा से आगे बढ़कर भारत की बहुभाषिक संरचना के प्रश्न तक पहुंचती है। सिंह ने कहा कि भारत की भाषायी विविधता उसकी सांस्कृतिक शक्ति है। मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, ओड़िया, असमिया, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु और तमिल सहित देश की विभिन्न भाषाएं केवल संचार के माध्यम नहीं, बल्कि अपने-अपने समाज की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक चेतना की वाहक हैं। ऐसे में हिंदी को सशक्त करने का अर्थ किसी अन्य भारतीय भाषा के महत्व को कम करना नहीं हो सकता।
इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत को भाषायी एकरूपता नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों के नागरिकों के बीच सहज संवाद कायम हो। उनके अनुसार हिंदी व्यापक संपर्क की भूमिका निभाने की क्षमता रखती है। इसी विचार को स्पष्ट करते हुए सिंह ने कहा—“हिंदी जोड़ने की भाषा है, तोड़ने की नहीं।”
श्री सिंह के तर्क का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हालांकि राजभाषा के सांस्कृतिक गौरव से अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत से जुड़ा है। उनका कहना है कि शासन की भाषा नागरिक की समझ से दूर नहीं होनी चाहिए। किसी किसान को अपने अधिकार के लिए आवेदन करना हो, किसी श्रमिक को सरकारी आदेश समझना हो अथवा किसी सामान्य नागरिक को प्रशासनिक निर्णय का अर्थ जानना हो, तो भाषा ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसके अर्थ तक पहुंचने के लिए उसे किसी मध्यस्थ की आवश्यकता पड़े।
उनके अनुसार लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तब होती है जब नागरिक अपने ऊपर लिए गए निर्णयों को समझ सके और अपने अधिकारों तथा दायित्वों के बारे में स्पष्ट जानकारी रख सके। इसी बिंदु पर भाषा प्रशासनिक सुविधा से आगे बढ़कर नागरिक अधिकारों की पहुंच का प्रश्न बन जाती है।
न्यायपालिका के संदर्भ में सिंह ने इसी भाषायी दूरी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज भी गांवों और सामान्य सामाजिक परिवेश में ऐसे लोग हैं जो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों एवं निर्णयों में प्रयुक्त जटिल अंग्रेजी को सहजता से नहीं समझ पाते। उनका प्रश्न अंग्रेजी के अस्तित्व का विरोध नहीं, बल्कि उस दूरी का है जो न्यायिक निर्णय और उससे प्रभावित नागरिक के बीच भाषा के कारण पैदा होती है।
यदि किसी निर्णय का सीधा प्रभाव किसी व्यक्ति की जमीन, स्वतंत्रता, अधिकार या भविष्य पर पड़ता है और वह व्यक्ति उस निर्णय का आशय ही सहज रूप से नहीं समझ पाता, तो न्याय की अनुभूति कितनी पूर्ण है—सिंह का यह सवाल न्याय और भाषा के संबंध को एक गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श के रूप में सामने रखता है।
यहीं हिंदी को राजभाषा के रूप में प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण पक्ष उभरता है। हिंदी का प्रश्न केवल भाषा के सम्मान का प्रश्न नहीं है। यह शासन को अधिक बोधगम्य, उत्तरदायी और जनोन्मुख बनाने से भी जुड़ा है। राज्य के निर्णय नागरिक की समझ के जितने निकट होंगे, शासन और जनता के बीच संवाद और विश्वास की संभावना उतनी ही मजबूत होगी। उनके विचार में राजभाषा की वास्तविक सार्थकता सरकारी पट्टिकाओं, समारोहों और कार्यालयी घोषणाओं से अधिक उस स्थिति में दिखाई देगी, जब सामान्य नागरिक राज्य के निर्णयों को बिना भाषायी बाधा के समझ सके।
शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी सिंह ने अंग्रेजी की अनिवार्यता से जुड़ी धारणा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह मानने का कोई तार्किक आधार नहीं है कि उच्च शिक्षा या विज्ञान का गंभीर अध्ययन केवल अंग्रेजी में ही संभव है। गणित, भूगोल, इतिहास, भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषय हिंदी में भी गंभीरता और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ पढ़ाए जा सकते हैं। उनके अनुसार कोई भाषा जन्म से विज्ञान की भाषा नहीं होती। जिस भाषा में ज्ञान का सृजन, अनुवाद, शोध और विमर्श लगातार होता है, वह समय के साथ ज्ञान-विज्ञान की समर्थ भाषा बन सकती है।
हालांकि सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि इसके लिए केवल भावनात्मक आग्रह पर्याप्त नहीं होगा। हिंदी की वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करने के लिए आधुनिक शब्दावली का विकास, उच्चस्तरीय पाठ्य सामग्री का निर्माण, गुणवत्तापूर्ण अनुवाद, हिंदी में शोध और मौलिक ज्ञान-सृजन को संस्थागत प्रोत्साहन देना होगा। यदि बड़ी आबादी ज्ञान तक पहुंचने से पहले किसी दूसरी भाषा की जटिलता से जूझने को विवश होती है, तो यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं रह जाता; यह ज्ञान की समान पहुंच का प्रश्न बन जाता है।
सिंह ने हिंदी भाषी समाज की एक विडंबना की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार अनेक अभिभावक बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दिलाने को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं। उन्होंने अंग्रेजी सीखने के महत्व से इनकार नहीं किया, बल्कि इसे वैश्विक अवसरों के लिए उपयोगी माना। लेकिन अपनी भाषा को हीन समझना किसी भी समाज के आत्मविश्वास के लिए उचित नहीं है। उनका विचार है कि बच्चे की वैचारिक नींव अपनी भाषा में मजबूत हो और इसके बाद वह दूसरी भाषाओं के संसार में प्रवेश करे तो उसकी भाषायी क्षमता अधिक व्यापक हो सकती है। दूसरी भाषा सीखना प्रगति है, लेकिन अपनी भाषा से लज्जित होना प्रगति नहीं।
भाषा का यह प्रश्न अंततः संस्कृति और सामाजिक स्मृति तक पहुंचता है। सिंह के विचारों में हिंदी केवल शब्दों और वाक्यों का माध्यम नहीं है। उसमें पीढ़ियों का अनुभव, लोक की स्मृति, संस्कार, संबंधों की आत्मीयता और सामूहिक चेतना भी सुरक्षित रहती है। जिस भाषा में मां बच्चे को पहली बार पुकारती है, लोक अपनी कथा कहता है और समाज अपने सुख-दुःख को व्यक्त करता है, उसे केवल कार्यालयी प्रयोग तक सीमित करना उसके व्यापक सांस्कृतिक स्वरूप को सीमित करना होगा।
इसीलिए सिंह के अनुसार हिंदी को राजभाषा के रूप में मजबूत करने का अर्थ किसी अन्य भारतीय भाषा को पीछे करना नहीं है। इसका आशय भारतीय भाषाओं के व्यापक परिवार के बीच हिंदी की संपर्ककारी भूमिका को मजबूत करना है। उनके विचार में हिंदी का विकास तभी भारतीय संदर्भ में सार्थक होगा, जब उसमें वर्चस्व की भावना के बजाय संवाद, आग्रह के बजाय आत्मीयता और अहंकार के बजाय आत्मविश्वास हो।

विशेष वार्ता के समापन पर पूर्व प्रशासनिक अधिकारी के.के. तिवारी ने अजयदीप सिंह के विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि हिंदी को लेकर उन्होंने जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, वह गंभीर विचार का विषय है। तिवारी ने कहा कि हिंदी को केवल बोलचाल की भाषा मानने के बजाय उसके भीतर निहित संस्कार, संवेदना और परिष्कार को जीवन में उतारने की आवश्यकता है।
रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए तिवारी ने कहा कि रामचरितमानस पढ़ना केवल राम की कथा पढ़ना नहीं है; उसके आदर्शों को जीवन में उतारना ही उसके मर्म को सार्थक करता है। इसी प्रकार हिंदी बोलना और लिखना मात्र पर्याप्त नहीं है। हिंदी के भीतर निहित संवेदना, संस्कार और परिष्कार को व्यवहार में उतारना ही भाषा के प्रति वास्तविक सम्मान होगा।
तिवारी ने अजयदीप सिंह के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि हिंदी के प्रश्न को केवल भाषा तक सीमित रखने के बजाय उसे राष्ट्र, समाज, शिक्षा, न्याय और संस्कार से जोड़कर देखने की आवश्यकता है। उनके अनुसार ऐसी चर्चाएं हिंदी दिवस को महज औपचारिक आयोजन से आगे ले जाकर आत्ममंथन का अवसर बना सकती हैं।
हिंदी दिवस का मूल प्रश्न भी यहीं खड़ा होता है—क्या हिंदी को वर्ष में एक दिन मंच पर सम्मानित किया जाएगा या उसे वर्ष के प्रत्येक दिन विचार, शिक्षा, प्रशासन, न्याय और सार्वजनिक जीवन में वास्तविक स्थान मिलेगा? भाषा तब केवल संचार का माध्यम रहती है, जब तक वह जीवन के निर्णयों और चिंतन को प्रभावित नहीं करती। जब वही भाषा विचार और व्यवहार का आधार बनने लगती है, तब वह संस्कृति और सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाती है।
अजयदीप सिंह के संदेश का सार इसी बिंदु पर केंद्रित है—हिंदी को किसी अन्य भारतीय भाषा के विरुद्ध खड़ा किए बिना, सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ उसे ज्ञान, न्याय, प्रशासन और जनसंवाद की समर्थ भाषा बनाया जाए। क्योंकि हिंदी की प्रतिष्ठा का अंतिम प्रश्न केवल हिंदी की प्रतिष्ठा नहीं है; यह उस नागरिक की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है जो अपनी भाषा में सोचता है, अपनी भाषा में सपने देखता है और अपने अधिकारों को अपनी भाषा में समझना चाहता है।
और अंततः हिंदी दिवस कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का प्रश्न बनकर सामने आता है—क्या हिंदी केवल हमारी जिह्वा पर रहेगी, या हमारे चिंतन, प्रशासन, न्याय, शिक्षा और अंतःकरण में भी अपना वास्तविक स्थान बनाएगी?